सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, भारत के स्कूलों में अब छात्राओं को देना होगी ये सुविधाएं, जाने गाइडलाइंस
सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए देश के सभी स्कूलों के लिए नए और कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने 'मासिक धर्म स्वच्छता' (Menstrual Hygiene) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' का हिस्सा माना है।
इस फैसले की मुख्य बातें और विस्तार नीचे दिया गया है। भारत के स्कूलों में अब मुफ्त सैनिटरी पैड और अगल टॉयलेट जरूरी, जानिए क्या है पूरा मामला।
1. मुफ्त सैनिटरी पैड अनिवार्य
किनके लिए: कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं के लिए।
नियम: सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों को छात्राओं को मुफ्त में सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने होंगे।
क्वालिटी: कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ये पैड 'ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल' (पर्यावरण के अनुकूल) होने चाहिए ताकि कचरा प्रबंधन में समस्या न हो। ये वेंडिंग मशीन या स्कूल में किसी तय स्थान पर आसानी से उपलब्ध होने चाहिए।
2. अलग और आधुनिक शौचालय
लैंगिक पृथक्करण: हर स्कूल (शहरी और ग्रामीण) में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग कार्यात्मक (Functional) शौचालय होने चाहिए।
सुविधाएं: इन शौचालयों में हर समय साफ पानी और हाथ धोने के लिए साबुन की व्यवस्था अनिवार्य है।
दिव्यांग अनुकूल: सभी नए और पुराने शौचालय इस तरह डिजाइन होने चाहिए कि दिव्यांग बच्चे भी उनका आसानी से उपयोग कर सकें।
3. 'MHM कॉर्नर' (Menstrual Hygiene Management Corner)
अदालत ने स्कूलों में एक विशेष कोना या स्थान बनाने का निर्देश दिया है जहाँ:
आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त यूनिफॉर्म और इनरवियर रखे हों।
पैड डिस्पोज करने के लिए डिस्पोजेबल बैग और सुरक्षित कचरा पात्र (Dustbins) मौजूद हों।
4. गरिमा और शिक्षा का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच) ने कहा कि:
"मासिक धर्म कोई शर्म का विषय नहीं है। जब इस पर स्कूलों में खुलकर चर्चा होगी, तो इससे जुड़ी वर्जनाएं खत्म होंगी। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लड़कियों का स्कूल छोड़ना उनके शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।"
5. जिम्मेदारी और जवाबदेही
राज्यों की भूमिका: सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस नीति को तुरंत लागू करने का निर्देश दिया गया है।
निगरानी: कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि सरकारी या निजी स्कूल इन सुविधाओं को देने में विफल रहते हैं, तो संबंधित सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा और स्कूलों की मान्यता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
स्कूलों के लिए क्या है गाइडलाइंस
सुप्रीम कोर्ट के इस विस्तृत आदेश के बाद, केंद्र सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्कूलों के लिए एक सख्त चेकलिस्ट और गाइडलाइंस जारी की हैं। इनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुविधा केवल कागजों पर न रहे, बल्कि जमीन पर लागू हो। यहाँ उन प्रमुख गाइडलाइन्स की लिस्ट दी गई है जो अब हर स्कूल को माननी होंगी।
1. बुनियादी ढांचा (Infrastructure) की चेकलिस्ट
अनुपात (Ratio): हर 40 छात्राओं पर कम से कम 1 कार्यात्मक शौचालय होना अनिवार्य है।
गोपनीयता (Privacy): शौचालयों के दरवाजों में कुंडी (Latch) और पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए। साथ ही, शीशा और कपड़े बदलने के लिए हुक होना जरूरी है।
इंसिनरेटर (Incinerator): इस्तेमाल किए गए पैड्स के सुरक्षित निपटान के लिए स्कूल परिसर में इलेक्ट्रिक या मिट्टी के इंसिनरेटर (जलाने वाली मशीन) लगाने का सुझाव दिया गया है।

2. वितरण प्रणाली (Distribution System)
वेंडिंग मशीन: स्कूल के 'गर्ल्स कॉमन रूम' या शौचालय के पास ऑटोमैटिक सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें लगानी होंगी, जिन्हें छात्राएं बिना किसी हिचकिचाहट के इस्तेमाल कर सकें।
स्टॉक रजिस्टर: स्कूल के स्वास्थ्य प्रभारी को हर महीने पैड्स के स्टॉक और वितरण का रिकॉर्ड रखना होगा ताकि सप्लाई कभी खत्म न हो।
3. जागरूकता और प्रशिक्षण
मासिक धर्म स्वच्छता सत्र: हर महीने कम से कम एक अनिवार्य सत्र (Session) आयोजित किया जाएगा जिसमें छात्राओं को स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा।
नोडल शिक्षक: हर स्कूल में एक महिला शिक्षक को 'मासिक धर्म स्वच्छता नोडल अधिकारी' के रूप में नामित किया जाएगा, जिससे छात्राएं अपनी समस्याएं साझा कर सकें।
4. बजट और फंडिंग
सरकारी स्कूल: इनका खर्च केंद्र की 'समग्र शिक्षा' योजना और राज्य सरकारों के बजट से उठाया जाएगा।
निजी स्कूल: निजी स्कूलों को यह सुविधाएं अपने मौजूदा संसाधनों से उपलब्ध करानी होंगी और वे इसके लिए अलग से कोई 'स्वच्छता शुल्क' नहीं वसूल पाएंगे।
5. निगरानी का स्तर, जिम्मेदारी
स्कूल स्तर: प्रधानाचार्य द्वारा मासिक रिपोर्ट तैयार करना।
जिला स्तर: जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा औचक निरीक्षण।
राज्य स्तर: एक ऑनलाइन डैशबोर्ड के माध्यम से डेटा को ट्रैक करना।
6. कार्यान्वयन की समय सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को 4 सप्ताह के भीतर अपना रोडमैप पेश करने और अगले सत्र (2026-27) की शुरुआत तक सभी सुविधाएं सुनिश्चित करने का अल्टीमेटम दिया है।
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